सोमवार, अप्रैल 02, 2007
A couple of poems
I was browsing through my collection of poems and came across these two. I couldn't help but notice the striking similarity with the song "Jag Jaa" from Omkara.
Here are the two poems. The poet is yet unknown to me. Will update it as soon as I know.
--------
सुबह की गोरी
रात की काली चादर ओढ़े
मुँह को लपेटे
सोई है कब से
रूठ के सबसे
सुबह की गोरी
आँख न खोले
मुँह से न बोले
जब से किसी ने
कर ली है सूरज की चोरी
आओ
चल के सूरज ढूंढे
और न मिले तो
किरन किरन फ़िर जमा करें हम
और इक सूरज नया बनाएँ
सोई है कब से
रूठ के सबसे
सुबह की गोरी
उसे जगाएँ
उसे मनाएँ
--------------
जाग री
बीत्ती विभावरी जाग री ।
अंबर पनघट में भिगो रही -
तारा घट ऊषा नागरी ।
खग कुल कुल-कुल सा बोल रहा,
किस्लय का आंचल डोल रहा,
लो यह लत्तिका भी भर लाई
मधु मुकुल नवल रन गागरी ।
अधरों में राग अमंद पिये,
अलकों में मलयज बंद किये,
तू अबतक सोयी है आली -
आंखो में भरे विहाग री ।
Here are the two poems. The poet is yet unknown to me. Will update it as soon as I know.
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सुबह की गोरी
रात की काली चादर ओढ़े
मुँह को लपेटे
सोई है कब से
रूठ के सबसे
सुबह की गोरी
आँख न खोले
मुँह से न बोले
जब से किसी ने
कर ली है सूरज की चोरी
आओ
चल के सूरज ढूंढे
और न मिले तो
किरन किरन फ़िर जमा करें हम
और इक सूरज नया बनाएँ
सोई है कब से
रूठ के सबसे
सुबह की गोरी
उसे जगाएँ
उसे मनाएँ
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जाग री
बीत्ती विभावरी जाग री ।
अंबर पनघट में भिगो रही -
तारा घट ऊषा नागरी ।
खग कुल कुल-कुल सा बोल रहा,
किस्लय का आंचल डोल रहा,
लो यह लत्तिका भी भर लाई
मधु मुकुल नवल रन गागरी ।
अधरों में राग अमंद पिये,
अलकों में मलयज बंद किये,
तू अबतक सोयी है आली -
आंखो में भरे विहाग री ।