शनिवार, फ़रवरी 11, 2006
न था कुछ ..
न था कुछ, तो खुदा था, कुछ न होता, तो खुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता
हुआ जब ग़म से यूँ बे हिस, तो ग़म क्या सर के कटने का
न होता गर जुदा तन से, तो जानू पर धरा होता
हुई मुद्दत कि "ग़ालिब" मर गया, पर याद आता है
वो हर एक बात पर कहना, यूँ होता तो क्या होता
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता
हुआ जब ग़म से यूँ बे हिस, तो ग़म क्या सर के कटने का
न होता गर जुदा तन से, तो जानू पर धरा होता
हुई मुद्दत कि "ग़ालिब" मर गया, पर याद आता है
वो हर एक बात पर कहना, यूँ होता तो क्या होता