<body>

गुरुवार, सितंबर 01, 2005

हंस करो पुरातन बात... 

हंस करो पुरातन बात,
कौन देस से आया हंस, उतरना कौन घाट?
कहाँ हंसा बिसराम किया है, कहाँ लगाए आस?
अब ही हंसाँ चेत सबेरा, चलो हमारे साथ!
संसाय-सोक वहाँ नहि व्यापै, नहि काल के त्रास;
हिआँ मदन-बन फूल रहे हैं, आवे सोहं बास,
मन भौंरा जहाँ अरुझ रहे हैं, सुख की ना अभिलास.

- दास कबीर

Another one by Kabir and my fascination with Hans continues :)

[Top]